MERI ZINDAGI KA MATLAB HO... TUM
मार दो मुझको अगर यादों में हीं ज़िंदा रखना है मुझको...
की सोतेय हुआई काबर-गाह में तेरी यादों का सुकून तो मिलेगा मुझ को...
ना रहेगी कोई तमना मुझ में बाक़ी तब-तोह
बासस तेरी याद का तोहफ़ा तोह मिलेगा मुझ को...
अगर समझतेय हो मुझको काबिल तोड़ा..
दो बूँद गिरा देना अपनी पलकों सेय क़ब्र पैर मेरी...
ज़िंदा रहकर तोह रहा भटकता तेरी मुहबत को सनम...
शायद इनसेय हीं मारकर मितजाएगी प्यास मेरी....
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© ABHISHEK KUMAR-(QAASID)
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