Monday, June 25, 2007

NAJANEY KYUN - II

नजानेय क्यूं
नजानेय क्यूं मेरी हैर रह मुदती है टेरेय अहसियानेय तक
नजानेय क्यूं मेरी हैर साँस जुड़ी है तेरी साँसों सेय...
नजानेय क्यूं हैर बात तेरी गूँजती है तेरी मेरे कानो में..
नजानेय क्यूं तू दूर हो कर भी मेरे पासस मेरे लगती है

संच कहता हूँ तू मेरी ज़िंदगई में है लहू बनकर
मेरी धड़कन की आवाज़ तू है
मेरे जहाँ में उत्तेय हैर उम्मीद का मसला तू है
तू है मेरी हैर रोज़ की तमना...

नजानेय क्यूं.... नजानेय क्यूं ... नजानेय क्यूं...
हैर सच....हैर तमना... हैर उम्मीद करती है सिर्फ़ एह सवाल मुझ सेय....
गर तू है शामिल मुझ में कुछ इस्स तरह...
तोह भी आज हम इस्स तरह जुड़ा क्यूं है _

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© ABHISHEK KUMAR-(QAASID)

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