NAJANEY KYUN
नजानेय क्यूं
नजानेय क्यूं...
जब भी तुझसेय दूर जनेय को क़दम बढ़ता हूँ...
आँखों में आशक़्क और दिल में दर्द को मौजूद पता हूँ...
हाँ है नही तुझ सेय कोई रिश्ता मेरा...
तेरी अब सेय है राह भी जुड़ा मुझ सेय....
मगर फिर भी तुझसेय नजनेऊ किस दोआर सेय...
ख़ुद को बँधा और मजबूर पता हूँ...
आज़मा लिए हुँनेय भी हैर मौक़ा-ए-मुमकिन तुझेय भूलने को...
बस किसी कोनेय सेय तुझेय-तेरी याद को मिटा नही पता हूँ...
कई सवाल पूछ टेय हैं ये तपकत्ेय आँसों मेरे मुझ सेय...
अब तोह मैं ख़ुद हीं एक सवाल सा हुआ जाता हूँ...
तेरी ख़ुश्बू को आज भी पता हूँ बसा मुझ में...
की इस्स कश्म-काश में मैं भी डूबा जाता हूँ...
अब बस ये इलत्ज़ा है तुझ सेय ज़ालिम...
अगर है तेरी तमना की चलती रहें संसेय मेरी...
जा छोड़ कर मुझ को इस्स तरह तू अपनेय आशियानेय में...
और ना आना फिर कभी मेरी जहाँ में...
की मैं भी चाहता हूँ जीना टेरेय बग़ैर...
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© ABHISHEK KUMAR-(QAASID)
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